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एक गंभीर शिक्षक के मायने

बहुत बड़ी चुनौती है आज के दौर में शिक्षक होना। राष्ट्र निर्माण की सतत प्रक्रिया में यूं तो सभी संस्थाएं और उससे जुड़े लोग अपने-अपने स्तर से प्रयास करते हैं पर एक शिक्षक यदि अपनी भूमिका को लेकर गंभीर है तो उसके मायने कुछ और होते हैं।

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प्राथमिक स्तर से ही शिक्षक यदि पाठ्यक्रम रटाने को ही पढ़ाना ना माने और सूचना एकत्र करने को ही ज्ञान का पर्याय न माने और विद्यार्थी के अंदर विषय की वास्तविक समझ तथा विश्लेषण की क्षमता विकसित करने पर सच में ध्यान दें तभी हम पूरी पीढ़ी को गुणवत्तापरक शिक्षा देने में कामयाब हो सकेगें। उच्च शिक्षा के स्तर पर एक अच्छे शिक्षक को कक्षा में कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसा तब ज़्यादा होता है जब शिक्षक की कक्षा लोकतांत्रिक हो और विद्यार्थियों को भी अपनी बात कहने की इजाज़त हो। कई बार परिवारों से मिली रूढि़वादी सोच और पूर्वाग्रहों का सामना एक शिक्षक को आए दिन करना पड़ता है पर यही इस कार्य का आनंद भी है, मैं तेरह वर्षों से राजनीति विज्ञान के अध्यापन से जुड़ी हूं और शायद ही कोई साल ऐसा बीता हो जब स्वतंत्रता, समानता, न्याय, लोकतंत्र, और विधि का शासन जैसी अवधारणाओं को पढ़ाते समय कक्षा में आरक्षण, जाति, राष्ट्रवाद के मसले पर तमाम तरह के सवाल ना उठते हों, ऐसे मौकों पर हमें हमारे शिक्षक याद आते है कि कैसे उनमें से कुछ ने हमारे सोचने के तरीके में उथल-पुथल मचा के रख दिया, और विचारों को तर्क की कसौटी पर कसने की आदत डाली।
आजकल जब बारहवीं के परीक्षा परिणामों में नब्बे प्रतिशत अंक लाने वाले बच्चों की भरमार हो गयी है, एक-एक अंक के लिए बच्चे और अभिभावक दोनों प्राथमिक कक्षाओं से ही जूझने लगे हैं। ऐसे परिदृश्य में बच्चों के अंक भले बहुत ज्यादा आएं पर समझ के स्तर पर कहीं न कहीं हमसे चूक ज़रूर हो रही है यदि एक बच्चा भारत का नक्शा तो बहुत अच्छा बना ले लेकिन भारत का मतलब समझे बिना बीए में आ जाए तो यह देश की शिक्षा व्यवस्था के लिए बहुत दुखद स्थिति है।
एकबारगी हम ये मान भी लें कि सारे मेधावी बच्चे बीटेक (जो कि सच नहीं है) कर रहे हैं तो क्या देश का इतिहास, समाज विज्ञान, संस्कृति का अध्ययन इतना कम महत्वपूर्ण है कि हम दोयम दर्जे के विद्यार्थियों और दोयम दर्जे के अध्यापन से संतोष कर लें। कहीं न कहीं से बात ये भी है कि समाज विज्ञान व मानविकों के शिक्षकों को भी अपने दायित्व को गंभीरता से समझना होगा। बहुत सारे सीनियर टीचरस को जब मैं ‘स्टैंडर्ड हैव गान टू द डागस’ कहते हुए सुनती हूं तो बहुत क्षोभ होता है। ये ख़ुद पूर्वाग्रहों से भरे ऐसे शिक्षक हैं जो सारा ठीकरा स्टूडेंट्स के सिरफोड़ ख़ुद को बचाना चाहते हैं।
नेताओं और नौकरशाहों के भ्रष्टाचार पर कुढ़ते रहने वाला शिक्षक समुदाय अपनी कक्षाएं न लेने की आदत को भ्रष्टाचार नहीं मानता। पिछले साल लखनऊ विश्वविद्यालय की बीए तृतीय वर्ष की उत्तर पुस्तिकाओं को जांचते हुए जिस तरह के उत्तर पढऩे को मिले वो काफी चौंकाने वाले थे, जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति से संबंधित सवाल के जवाब में पढ़ा की जयप्रकाश नारायण वो शख्स़ थे जिन्होंने घोड़े पर सवार हो दोनो हाथों में तलवार पकड़ हज़ारों का गला काटा और संपूर्ण क्रांति ले आए। शायद इन बच्चों ने पूरे साल कक्षाओं का मुंह भी नही देखा था।
ऐसी समझ के साथ बीए, एमए करते जाने का क्या औचित्य है, बेहतर होता कि प्राथमिक कक्षाओं से ही हम सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता से समझौते ना करें, कमज़ोर नींव पर बनी इमारत का ढहना तय होता है।
(लेखिका अवध डिग्री कॉलेज असिस्टेेंट प्रोफेसर है, इनके अपने विचार हैं।)

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