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शहरी स्कूलों में ज्यादा रूझान, ग्रामीण की खाली पड़ी सीटें

इसे शिक्षा विभाग की लापरवाही मानें या स्कूल संचालकों की मनमानी कि गरीब परिवार के बच्चों का निजी स्कूलों में पढ़ने का सपना महज सपना बनकर रह गया है। जिले में नियम 134ए के तहत निर्धारित चार हजार से अधिक सीटों में से मात्र 1089 बच्चों को ही दाखिला मिला है।
वहीं शहर में 80 सीटें भर गई। दाखिले के दूसरे चरण की डेट भी 20 जून को पूरी हो चुकी है। दाखिले से वंचित बच्चों के अभिभावक अब भी शिक्षा विभाग अधिकारियों के चक्कर काट रहे लेकिन उनकी समस्या का समाधान नहीं हो रहा। अभिभावक चांदराम, सतबीर, समुंद्र सिंह, रतिराम, गोबिंद आदि का कहना है कि अब उनके बच्चे कहां पढ़ेंगे। उन्हें स्कूल अलॉट किए गए लेकिन वहां पर दाखिला नहीं हो मिला।

ग्रीष्मकालीन छुट्टियां बनी अड़चन, निजी स्कूल बना रहे बहाना

एक जून से चल रही ग्रीष्मकालीन छुट्टियां भी गरीब बच्चों के दाखिले में अड़चन बनी है। क्योंकि निजी स्कूलों ने भी छुट्टियों का बहाना बनाकर दाखिला नहीं दिया। हालांकि सरकार के निर्देश पर शिक्षा निदेशालय की ओर से सभी खंड शिक्षा अधिकारियों को निर्देश जारी किए थे कि वे छ़़़़़़़़़़़़़़़़ट्टियों में ही अपने कार्यालय में बच्चे व स्कूल प्रतिनिधि को बुलाकर दाखिला कराएं लेकिन अधिकारियों ने भी केस आए उन्हें दाखिला दिलाने के लिए संबंधित स्कूल मुखिया को कह दिया गया। इसके बाद यह पता नहीं किया कि स्कूल संचालक ने दाखिला दिया है या नहीं। अब सवाल यह है कि शिक्षा सत्र का आधा समय जाने को है और गरीब बच्चों को दाखिला तक नहीं मिल पाया है। ऐसे में उनकी पढ़ाई बाधित हो गई है। सरकार व प्रशासन बच्चों के भविष्य बारे कोई विशेष ध्यान नहीं दे रहे।

शहरी स्कूलों में ज्यादा रूझान, ग्रामीण की खाली पड़ी सीटें 

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