शिक्षा निदेशालय द्वारा शुक्रवार को आरटीई (राइट टू एजुकेशन) नियम 134-ए के
अंतर्गत निजी स्कूलों में दाखिलों के लिए शेड्यूल जारी करते ही विवाद शुरू
हो गया।
निजी स्कूल संचालक एकमत से नियम 134-ए के दाखिलों के विरोध में उतर आए
हैं। स्कूल संचालकों ने स्पष्ट किया कि पहले सरकार पिछले सत्र में दाखिला
प्राप्त विद्यार्थियों की फीस की भुगतान करें। ऐसा ना होने पर आगामी सत्र
में शिक्षा विभाग की सूची के अनुसार नए विद्यार्थियों को अपने स्कूलों में
दाखिला नहीं देंगे। हालांकि यह भी स्पष्ट किया कि स्कूल अपने-अपने स्तर पर
गरीब बच्चों का एडमिशन जरूर करेंगे। इधर, स्वास्थ्य शिक्षा सहयोग संगठन
द्वारा विद्यार्थियों को दाखिला दिलाने के लिए निजी स्कूलों के खिलाफ
हाईकोर्ट में केस करने की प्रक्रिया की जा रही है। संगठन प्रदेशाध्यक्ष
बृजपाल परमार ने कहा कि सरकार व निजी स्कूलों के आपसी हितों के टकराव से
विद्यार्थियों का दाखिला देने से मना नहीं किया जा सकता। अगर निजी स्कूल
ऐसा करते है तो शिक्षा नियमावली 2003 के तहत शिक्षा विभाग द्वारा सख्त
कार्रवाई का प्रावधान है, स्कूल की मान्यता भी रद्द हो सकती हैं। वहीं,
हरियाणा प्राइवेट स्कूल संघ के प्रदेशाध्यक्ष सत्यवान कंुडू ने कहा कि मांग
पूरी नहीं हुई तो जल्द की आंदोलन किया जाएगा।
स्कूलों ने दिया था 17,320 विद्यार्थियों को दाखिला
सत्र 2017-18 में नियम 134-ए के तहत प्रदेशभर के निजी स्कूलों में करीब
17,320 विद्यार्थियों को दाखिला दिया गया था। इनमें हिसार के करीबन 1163,
रेवाड़ी के 650, पानीपत के 476, रोहतक में 869, अंबाला 896 व अन्य जिलों के
स्कूलों में भी 300 से 700 विद्यार्थी शामिल है। विभाग द्वारा निजी
स्कूलों को प्राइमरी के प्रत्येक बच्चों की 200 रुपए फीस व मिडिल कक्षाओं
की 500 रुपए फीस देनी थी। अगर औसत 400 रुपए लगाया जाए, तो 8 करोड़ रुपए फीस
सरकार पर बकाया है।
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