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स्कूलों को नहीं छात्रों को दें फंड , शिक्षा का अधिकार कानून ही बन रहा शिक्षा की राह का सबसे बड़ा रोड़ा

चंडीगढ़ : गैर सहायता प्राप्त (अनएडेड) निजी स्कूलों की अखिल भारतीय संस्था नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलाएंस (नीसा) ने शिक्षा का अधिकार कानून की तमाम विसंगतियों के खिलाफ राष्ट्रव्यापी मुहीम छेड़ने की योजना बनाई है। इसकी शुरुआत चंडीगढ़ से होगी जहां देशभर से जुटे स्कूल एसोसिएशन और स्कूल संचालक तीन दिनों तक बैठक करेंगे और आगे की रणनीति तैयार करेंगे।
इस दौरान बजट स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता को और बेहतर करने के लिए प्रोत्साहित और प्रशिक्षित भी किया जाएगा। तीन दिवसीय बैठक में उठने वाले मुद्दों व समस्याओं को लेकर प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों, शिक्षामंत्रियों सहित केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री से मुलाकात कर समाधान का आग्रह किया जाएगा।
चंडीगढ़ में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में नीसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कुलभूषण शर्मा ने सरकार से स्कूलों के बजाय सीधे छात्रों को फंड देने की मांग की। उन्होंने कहा कि शिक्षा के अधिकार के बजाय बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसा तभी संभव हो सकता है जबकि सरकार स्कूलों को फंड न देकर सीधे छात्रों को वाऊचर के माध्यम से फंड उपलब्ध कराए। जब छात्र स्वयं स्कूल की फीस भरने में सक्षम होगा तभी उसे अपने पसंद की स्कूल में दाखिला लेने की आजादी मिलेगी। इस स्थिति में स्कूलों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और गुणवत्ता में सुधार देखने को मिलेगा। नीसा के राष्ट्रीय सचिव पार्थ जे शाह ने कहा कि नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लाया गया शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) ही छात्रों की शिक्षा की राह का सबसे बड़ा रोड़ा बन गया है। उन्होंने कहा कि आरटीई कानून के कई उपनियम अत्यंत दोषपूर्ण हैं। इन दोषपूर्ण उपनियमों और विसंगतियों के कारण देशभर में 1 लाख से अधिक स्कूलों पर तालाबंदी का खतरा उत्पन्न हो गया है।
पार्थ ने कहा कि इससे उन 2 करोड़ से ज्यादा ऐसे गरीब बच्चों का भविष्य प्रभावित होगा जिन्होंने सरकारी स्कूलों की नि:शुल्क शिक्षा के बजाय निजी स्कूलों में पैसे चुकाकर दाखिला लेने को वरीयता दी थी। नीसा के उपाध्यक्ष राजेश मल्होत्र ने सरकार पर शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर संजीदा न होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि स्कूलों को मान्यता प्रदान करने के लिए बिल्डिंग, खेल के मैदान, अध्यापकों की शैक्षणिक योग्यता और वेतन आदि तमाम चीजों की बातें की जाती हैं लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर कोई बात नहीं की जाती।  
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