प्रदेश के प्राथमिक शिक्षकों की भर्ती का मामला सुलझने की बजाय और उलझता
दिख रहा है। करीब साढ़े नौ हजार शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया सालों से
कानूनी प्रक्रियाओं में अटकी है।
यही वजह है कि स्कूलों को नए शिक्षक नहीं मिल पा रहे हैं। सरकार ने पहली मेरिट सूची जारी होने के बाद शिक्षकों को जिला कार्यालयों में ज्वाइन तो करवा दिया लेकिन उन्हें स्टेशन नहीं मिल पाया। अब नई सूची से 1259 चयनित उम्मीदवारों की नौकरी खतरे में पड़ गई है, ऐसे में कानूनी लड़ाई और लंबी हो सकती है। इन कानूनी पेचिदगियों को पहले ही समाधान करने की आवश्यकता है ताकि छात्रों और शिक्षकों का इंतजार और लंबा न हो। निश्चित तौर पर भर्ती प्रक्रिया में कुछ ऐसे पेंच छोड़ दिए जाते हैं जिसको आधार बना कुछ लोग अदालत पहुंच जाते हैं। एक बार कानूनी लड़ाई शुरू होने के बाद यह मामला और खिंचता चला जाता है। सरकार ने वर्ष 2012 में जेबीटी शिक्षकों की भर्ती के लिए आवेदन मांगे थे। चूंकि यह प्रक्रिया इतनी लंबी खिंच गई कि 2013 में पात्रता परीक्षा पास होने वाले अभ्यर्थियों ने भी नियुक्ति के लिए दावा ठोंक दिया।
उसके बाद मामला कानूनी प्रक्रियाओं में उलझता रहा और अब हाईकोर्ट ने संयुक्त सूची जारी करने के आदेश दे दिए। यह पहला मौका नहीं है कि भर्ती प्रक्रिया विवादों में फंसी हो। पिछले 15 सालों में कई भर्तियां तो रद भी करनी पड़ी। एक तो सरकारी नौकरी के प्रति युवाओं का मोह और उस पर सरकार की स्पष्ट नीति का अभाव पूरी प्रक्रिया को विवादों में फंसा देता है। क्या सरकार भर्तियों पर स्पष्ट नीति नहीं बना सकती? सरकार एक कैलेंडर जारी करे। उसके अनुसार शिक्षक पात्रता परीक्षा का आयोजन हो। यही परीक्षा नौकरी की गारंटी भी बने। हर वर्ष उतने ही शिक्षकों को उत्तीर्ण घोषित किया जाए जितने पद उस वर्ष सृजित होने वाले हैं या रिक्त होने वाले हैं। अधिकतर सरकारें नियोजित प्लान से बचने का प्रयास रहती है क्योंकि फिर सत्ता व शासन कुछ भी इधर-उधर करने का विकल्प शेष नहीं रहेगा। जिस तरह से सरकार ने शिक्षकों के तबादलों की प्रक्रिया से राजनीति का सफाया किया है, उसी तर्ज पर नियुक्ति की प्रक्रिया भी इस दखलअंदाजी से दूर हो जाए तो फिर न ऐसे विवाद रहेंगे और न कोई मसला।
[ स्थानीय संपादकीय : हरियाणा ]
यही वजह है कि स्कूलों को नए शिक्षक नहीं मिल पा रहे हैं। सरकार ने पहली मेरिट सूची जारी होने के बाद शिक्षकों को जिला कार्यालयों में ज्वाइन तो करवा दिया लेकिन उन्हें स्टेशन नहीं मिल पाया। अब नई सूची से 1259 चयनित उम्मीदवारों की नौकरी खतरे में पड़ गई है, ऐसे में कानूनी लड़ाई और लंबी हो सकती है। इन कानूनी पेचिदगियों को पहले ही समाधान करने की आवश्यकता है ताकि छात्रों और शिक्षकों का इंतजार और लंबा न हो। निश्चित तौर पर भर्ती प्रक्रिया में कुछ ऐसे पेंच छोड़ दिए जाते हैं जिसको आधार बना कुछ लोग अदालत पहुंच जाते हैं। एक बार कानूनी लड़ाई शुरू होने के बाद यह मामला और खिंचता चला जाता है। सरकार ने वर्ष 2012 में जेबीटी शिक्षकों की भर्ती के लिए आवेदन मांगे थे। चूंकि यह प्रक्रिया इतनी लंबी खिंच गई कि 2013 में पात्रता परीक्षा पास होने वाले अभ्यर्थियों ने भी नियुक्ति के लिए दावा ठोंक दिया।
उसके बाद मामला कानूनी प्रक्रियाओं में उलझता रहा और अब हाईकोर्ट ने संयुक्त सूची जारी करने के आदेश दे दिए। यह पहला मौका नहीं है कि भर्ती प्रक्रिया विवादों में फंसी हो। पिछले 15 सालों में कई भर्तियां तो रद भी करनी पड़ी। एक तो सरकारी नौकरी के प्रति युवाओं का मोह और उस पर सरकार की स्पष्ट नीति का अभाव पूरी प्रक्रिया को विवादों में फंसा देता है। क्या सरकार भर्तियों पर स्पष्ट नीति नहीं बना सकती? सरकार एक कैलेंडर जारी करे। उसके अनुसार शिक्षक पात्रता परीक्षा का आयोजन हो। यही परीक्षा नौकरी की गारंटी भी बने। हर वर्ष उतने ही शिक्षकों को उत्तीर्ण घोषित किया जाए जितने पद उस वर्ष सृजित होने वाले हैं या रिक्त होने वाले हैं। अधिकतर सरकारें नियोजित प्लान से बचने का प्रयास रहती है क्योंकि फिर सत्ता व शासन कुछ भी इधर-उधर करने का विकल्प शेष नहीं रहेगा। जिस तरह से सरकार ने शिक्षकों के तबादलों की प्रक्रिया से राजनीति का सफाया किया है, उसी तर्ज पर नियुक्ति की प्रक्रिया भी इस दखलअंदाजी से दूर हो जाए तो फिर न ऐसे विवाद रहेंगे और न कोई मसला।
[ स्थानीय संपादकीय : हरियाणा ]