फतेहाबाद, [मणिकांत मयंक]। देश के भविष्य को संस्कारों के सांचे में ढालने का प्रथम सोपान अर्थात प्राथमिक शिक्षा नीतिगत सहारे की प्रतीक्षा में है। कारण कि करीब दो साल से सतत प्रयोग शिक्षा की ठोस नीति नहीं दे पाया है। नतीजा? शिक्षा की नीति नदारद तो लाखों नौनिहालों का भविष्य एकल शिक्षक के हवाले।
यहां एकल का सीधा-सा तात्पर्य, एक स्कूल में एक ही शिक्षक के हाथों में पहली से पांचवीं तक के विद्यार्थियों को प्राथमिक शिक्षा देने की जिम्मेवारी। है न विडंबना? मगर यही दुखद हकीकत ...।
यह एकाध स्कूल से जुड़ी सच्चाई नहीं अपितु प्रदेश के सकल प्राथमिक स्कूलों में से दस फीसद की वास्तविकता है। इनमें हर आम ओ खास शामिल हैं। आलम यह कि सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष सुभाष बराला के गांव बढ़ईखेड़ा के नौनिहाल भी प्रतिनियुक्ति अर्थात डेपुटेशन वाले मास्टर साहब से ही संस्कारों के प्रथम सोपान पार करने को विवश हैं।
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अगर यकीन न हो तो हम आपको जमीनी हकीकत के लिए गांव बढ़ई खेड़ा लिए चलते हैं। सुबह के करीब 11 बजे हैं। यहां के प्राथमिक स्कूल में पांचवीं कक्षा के बच्चे-राजेश, मोनू, मुकेश, सोनी, देवेश 5 मजदूर किसी काम को 3 दिन में कर लेते हैं तो 2 मजदूर उसी काम को कितने दिन में कर लेंगे, इस उधेड़बुन में जुटा है।
पहली कक्षा के बच्चे दो दूनी चार का पहाड़ा जोर-जोर से पढ़ रहे हैं। बेशक, उनकी आवाज नीति-निर्माताओं तक नहीं पहुंच पा रही हो मगर ये बच्चे शायद यही कह रहे-हे सरकार, कम से कम एक दूनी दो अर्थात एक स्कूल पर दो गुरुजी तो दे दो?
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प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कर रहे इन बच्चों को डेपुटेशन पर पढ़ा रहे जूनियर बेसिक टीचर पूरनचंद बीच-बीच में टोकते हैं। कहते हैं-पढ़ाई जारी रखो। चंद्रकलां प्राइमरी स्कूल से आए पूरन भी अधूरी व्यवस्था से खुश नहीं हैं लेकिन संभवत: सरकारी सेवा की वजह से खामोश रहना ही बेहतर समझते हैं। सो, बोलें भी तो क्या? कारण कि 30-35 बच्चों में से 13 तो अब अनुपस्थित ही रहने लगे हैं। वे कहीं और शिक्षा पा रहे हैं। वहां जहां गुरुजी उपलब्ध हैं।
ऐसा भी नहीं है कि एकल शिक्षक के कारण केवल बच्चे ही स्कूल से गैरहाजिर हो रहे हैं। हैरत की बात तो यह कि तबादला नीति में उलझी शिक्षा की वजह से करीब 400 स्कूल इसलिए बंद हो गए क्योंकि वहां या तो बच्चे नहीं थे या फिर शिक्षक नदारद। बहरहाल, यहां कई सवाल एक साथ उठते हैं जो संवेदनाशून्य सरकार से सीधे तौर पर जुड़ जाते हैं।
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पहला तो यही कि एक जेबीटी से लेकर डायरेक्टर लेवल तक करीब 10 अधिकारी अथवा उच्चाधिकारी तक की जिम्मेदारी फिर भी बच्चों व शिक्षकों के बीच असंतुलन की स्थिति क्यों? अगर असंतुलन नहीं तो मर्ज करने की नीति क्यों नहीं अपनाती सरकार? रेशनलाइजेशन पर हीलाहवाली क्यों?
आरटीई के साथ सिंगल टीचर की विडंबना खत्म करने की त्वरित एवं तीव्र पहल क्यों नहीं कर रही सरकार? प्रदेश की विधानसभा के जनप्रतिनिधि क्यों नहीं मुखर हो पाते? 9 लाख भविष्य के साथ नीतिगत सोच का दिवालियापन क्यों? ऐसे तमाम सवाल हैं, निके तत्काल समाधान की दरकार है।
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प्रदेश में कुल प्राइमरी स्कूल - 8893
- पहली से पांचवीं तक कुल विद्यार्थी - 9 लाख से अधिक।
- सिंगल टीचर वाले कुल स्कूल : 713
- बंद हुए प्राइमरी स्कूल : 400
वर्ष 2011 से सिंगल टीचर सिस्टम
यह कोई नई बात नहीं रह गई है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सिंगल टीचर व्यवस्था की देन पूर्ववर्ती सरकार की देन है। वर्ष 2011 से ही एक शिक्षक के भरोसे सैकड़ों स्कूल चल रहे हैं। ऐसा तब है जबकि इसी साल करीब 7-8 हजार शिक्षकों की भर्ती भी हुई थी।
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राजकीय प्राथमिक शिक्षक संघ के महासचिव दीपक गोस्वामी का कहना है कि प्राइमरी एजूकेशन के क्षेत्र में यह अत्यंत ही दुखद परिस्थिति है। अहम सवाल यह कि अव्वल तो सरकार छात्रों की संख्या बढ़ाए। दूसरा यह कि सरकार विद्यार्थी व शिक्षकों के बीच संतुलन न होने पर स्कूलों में मर्जर पॉलिसी क्यों नहीं अपनाती? यह बेहद खेदजनक है।
शीघ्र होगी नई व्यवस्था : सिहाग
जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी दयानंद सिहाग कहते हैं कि सिंगल टीचर की व्यवस्था जल्द ही डबल में तब्दील होगी। नई एमआइएस के तहत एक स्कूल में कम से कम दो शिक्षक तो होंगे ही।
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यहां एकल का सीधा-सा तात्पर्य, एक स्कूल में एक ही शिक्षक के हाथों में पहली से पांचवीं तक के विद्यार्थियों को प्राथमिक शिक्षा देने की जिम्मेवारी। है न विडंबना? मगर यही दुखद हकीकत ...।
यह एकाध स्कूल से जुड़ी सच्चाई नहीं अपितु प्रदेश के सकल प्राथमिक स्कूलों में से दस फीसद की वास्तविकता है। इनमें हर आम ओ खास शामिल हैं। आलम यह कि सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष सुभाष बराला के गांव बढ़ईखेड़ा के नौनिहाल भी प्रतिनियुक्ति अर्थात डेपुटेशन वाले मास्टर साहब से ही संस्कारों के प्रथम सोपान पार करने को विवश हैं।
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अगर यकीन न हो तो हम आपको जमीनी हकीकत के लिए गांव बढ़ई खेड़ा लिए चलते हैं। सुबह के करीब 11 बजे हैं। यहां के प्राथमिक स्कूल में पांचवीं कक्षा के बच्चे-राजेश, मोनू, मुकेश, सोनी, देवेश 5 मजदूर किसी काम को 3 दिन में कर लेते हैं तो 2 मजदूर उसी काम को कितने दिन में कर लेंगे, इस उधेड़बुन में जुटा है।
पहली कक्षा के बच्चे दो दूनी चार का पहाड़ा जोर-जोर से पढ़ रहे हैं। बेशक, उनकी आवाज नीति-निर्माताओं तक नहीं पहुंच पा रही हो मगर ये बच्चे शायद यही कह रहे-हे सरकार, कम से कम एक दूनी दो अर्थात एक स्कूल पर दो गुरुजी तो दे दो?
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प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कर रहे इन बच्चों को डेपुटेशन पर पढ़ा रहे जूनियर बेसिक टीचर पूरनचंद बीच-बीच में टोकते हैं। कहते हैं-पढ़ाई जारी रखो। चंद्रकलां प्राइमरी स्कूल से आए पूरन भी अधूरी व्यवस्था से खुश नहीं हैं लेकिन संभवत: सरकारी सेवा की वजह से खामोश रहना ही बेहतर समझते हैं। सो, बोलें भी तो क्या? कारण कि 30-35 बच्चों में से 13 तो अब अनुपस्थित ही रहने लगे हैं। वे कहीं और शिक्षा पा रहे हैं। वहां जहां गुरुजी उपलब्ध हैं।
ऐसा भी नहीं है कि एकल शिक्षक के कारण केवल बच्चे ही स्कूल से गैरहाजिर हो रहे हैं। हैरत की बात तो यह कि तबादला नीति में उलझी शिक्षा की वजह से करीब 400 स्कूल इसलिए बंद हो गए क्योंकि वहां या तो बच्चे नहीं थे या फिर शिक्षक नदारद। बहरहाल, यहां कई सवाल एक साथ उठते हैं जो संवेदनाशून्य सरकार से सीधे तौर पर जुड़ जाते हैं।
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पहला तो यही कि एक जेबीटी से लेकर डायरेक्टर लेवल तक करीब 10 अधिकारी अथवा उच्चाधिकारी तक की जिम्मेदारी फिर भी बच्चों व शिक्षकों के बीच असंतुलन की स्थिति क्यों? अगर असंतुलन नहीं तो मर्ज करने की नीति क्यों नहीं अपनाती सरकार? रेशनलाइजेशन पर हीलाहवाली क्यों?
आरटीई के साथ सिंगल टीचर की विडंबना खत्म करने की त्वरित एवं तीव्र पहल क्यों नहीं कर रही सरकार? प्रदेश की विधानसभा के जनप्रतिनिधि क्यों नहीं मुखर हो पाते? 9 लाख भविष्य के साथ नीतिगत सोच का दिवालियापन क्यों? ऐसे तमाम सवाल हैं, निके तत्काल समाधान की दरकार है।
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प्रदेश में कुल प्राइमरी स्कूल - 8893
- पहली से पांचवीं तक कुल विद्यार्थी - 9 लाख से अधिक।
- सिंगल टीचर वाले कुल स्कूल : 713
- बंद हुए प्राइमरी स्कूल : 400
वर्ष 2011 से सिंगल टीचर सिस्टम
यह कोई नई बात नहीं रह गई है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सिंगल टीचर व्यवस्था की देन पूर्ववर्ती सरकार की देन है। वर्ष 2011 से ही एक शिक्षक के भरोसे सैकड़ों स्कूल चल रहे हैं। ऐसा तब है जबकि इसी साल करीब 7-8 हजार शिक्षकों की भर्ती भी हुई थी।
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राजकीय प्राथमिक शिक्षक संघ के महासचिव दीपक गोस्वामी का कहना है कि प्राइमरी एजूकेशन के क्षेत्र में यह अत्यंत ही दुखद परिस्थिति है। अहम सवाल यह कि अव्वल तो सरकार छात्रों की संख्या बढ़ाए। दूसरा यह कि सरकार विद्यार्थी व शिक्षकों के बीच संतुलन न होने पर स्कूलों में मर्जर पॉलिसी क्यों नहीं अपनाती? यह बेहद खेदजनक है।
शीघ्र होगी नई व्यवस्था : सिहाग
जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी दयानंद सिहाग कहते हैं कि सिंगल टीचर की व्यवस्था जल्द ही डबल में तब्दील होगी। नई एमआइएस के तहत एक स्कूल में कम से कम दो शिक्षक तो होंगे ही।
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