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तबादला नीति की सफलता पर है शंका: रामबीर ¨सह

 परिचय :
-जन्म: 1 दिसंबर 1971 को गांव सागरपुर में किसान परिवार में।
-शिक्षा : प्रारंभिक शिक्षा गांव के सरकारी स्कूल में तथा हाईस्कूल बल्लभगढ़ के अग्रवाल स्कूल से।

-शैक्षणिक योग्यताएं: बीएससी, लोक प्रशासन में एमए, लेबर लॉ में पीजी डिप्लोमा, मास कम्यूनिकेशन में पीजी डिप्लोमा।
- अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रदेश मंत्री व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के रोहतक में चार साल तक पूर्णकालिक प्रचारक रहे।
रुचि: राष्ट्रीय एकता व अखंडता के लिए कार्य करना।
इंट्रो:
राज्य सरकार ने शिक्षकों के लिए नई तबादला नीति बना दी है। इसके तहत अब एक शिक्षक पांच साल से ज्यादा शहर के किसी स्कूल में नहीं रहेगा। शिकायत से अलग शिक्षकों के सामान्य तबादले कंप्यूटराइज्ड होंगे। यह नीति सरकारी स्कूलों की दिशा और दशा सुधारने में कितना कारगर होगी। इस नीति के बाद प्रतिवर्ष शिक्षकों के तबादलों से होने वाली राजनीतिक परेशानी कितनी घटेगी और शिक्षक क्या इस तबादला नीति पर खरे उतरेंगे, इन कुछ सवालों को लेकर दैनिक जागरण के मुख्य संवाददाता बिजेंद्र बंसल ने हरियाणा स्कूल लेक्चर एसोसिएशन (हसला) के जिलाध्यक्ष रामबीर ¨सह से विस्तृत बातचीत की,प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश।
- शिक्षक तबादला नीति के प्रारूप का सरकारी स्कूलों को फायदा होगा?
-पहली बात तो मुझे शिक्षक तबादला नीति की सफलता पर शंका है। यह शंका इसलिए ज्यादा है कि इसमें 85 फीसद अध्यापकों के तबादले होंगे और जब 85 फीसद अध्यापकों के तबादले होंगे तो फिर वह स्थिति काफी भयंकर हो सकती है। आपकी जानकारी में ला दें कि जब शिक्षा विभाग 10 से 12 फीसद शिक्षकों के तबादले करता है तो न सिर्फ राज्य का सचिवालय शिक्षकों से भर जाता है बल्कि पूरी सरकार हिल जाती है। शिक्षकों के तबादले ही उन दिनों में अखबारों की सुर्खियां होते हैं।
-तो क्या तबादला नीति में खामियां हैं?
-आपकी जानकारी में ला दूं। मैंने तबादला नीति के जो तथ्य पढ़े हैं, उनमें एक भी ऐसा कारण नहीं है कि हम इस नीति का विरोध कर सकें। तबादला नीति पूरी तरह वैज्ञानिक आधार लेकर बनाई गई। रही बात शंका की तो इसके पीछे कारण यह है कि शिक्षकों के तबादले करने से व्यवस्था नहीं सुधरेगी बल्कि व्यवस्था सुधारने के लिए हमें समाज को जागृत करना होगा।
-चलिए, मोटी बात करते हैं, हमें यह बता दें कि सरकारी स्कूलों की शिक्षा में कैसे सुधार हो सकता है?
-सिर्फ और सिर्फ समाज जागरण से शिक्षा की दिशा और दशा बदलेंगी। मैं आपको बता दूं सरकारी स्कूलों से समाज का ध्यान हट गया है और निजी स्कूलों की तरफ हो गया है। इसलिए निजी स्कूल दिन प्रतिदिन तरक्की कर रहे हैं और सरकारी स्कूल पिछड़ रहे हैं। शैक्षणिक संसाधन निजी स्कूलों में भी तो समाज के ही लोग उपलब्ध करा रहे हैं। यहां तो यदि सरकार को समाज का साथ मिल जाए तो निश्चित तौर पर बड़ा बदलाव आ सकता है।
-सरकारी स्कूलों के परिणाम क्यों नहीं सुधर रहे हैं?
-शिक्षा के अधिकार को भी मैं एक कारण मानता हूं। अब शिक्षक दो कारणों से छात्रों की परीक्षा का सही मूल्यांकन नहीं करता। एक तो उससे सवाल-जवाब ज्यादा किए जाएंगे, दूसरे छात्रों को फेल करने का अर्थ है कि शिक्षकों की संख्या कम करना। हां, यदि अभिभावक भी स्कूलों पर ध्यान दें तो निश्चित रूप से सरकारी स्कूलों का शैक्षणिक वातावरण सुधर सकता है।
-प्राध्यापक और अध्यापकों की कमी दूर करने के लिए आपके संगठन के क्या प्रयास हैं?

-हमने जिला शिक्षाधिकारी के माध्यम से प्राध्यापकों और अध्यापकों की कमी दूर करने के लिए सरकार को प्रपत्र भिजवाए हैं मगर अभी तक इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। हम इन्हीं मांग को लेकर सरकार के सामने खड़े रहते हैं।
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